प्रथमदृष्टया हिंसा से यह
लगता है कि किसी को मारना-पीटना और खून-खराबा करना ही हिंसा है | मोटे तौर पर तो यह सही भी है , क्योंकि इस तरह के कार्यो में लगे रहने वाले व्यक्ति का
जीवन सकूँन भरा नहीं हो सकता| सभ्य समाज
में कानून का राज स्थापित है | ऐसी स्थिति में कानूनी कार्यवाही में फस कर समय और
पैसे की बर्बादी होती है| हिंसा का वैज्ञानिक पक्ष इससे भी ज्यादा गंभीर है |
शास्त्रों में क्रोध, द्वेष, कटुवचन, निंदा, घात-प्रतिघात आदि तामसिक अवगुण की
श्रेणी में आते है | ये सब हिंसा के ही अस्त्र-शस्त्र है | व्यक्ति जब इनका प्रयोग करता है, तो दुसरो से
ज्यादा क्षति उसकी अपनी होती है |
क्रोध तो वह घातक हथियार है
जो क्रोध करने वाले का पहले खून जलाता है | घात-प्रतिघात में आन्तरिक भय होता है
जो शरीर के अनेक हिस्सों को कमजोर बनता है | मानसिक रोगी तक लोग हो जाते है |
अवसाद की बीमारी की चपेट में आ जाते है | उम्र बढ़ने पर दिमेशिया (भूलने कि बिमारी)
हो जाती है | इसलिए ऋषियो-मुनियों ने इससे विरत रहने का उपदेश देते हुए ‘अहिंसा
परमो धर्मः ’ का सूत्र वाक्य दिया था | राष्ट्रपिता
महात्मा गाँधी ने अहिंसा का रास्ता इसलिए भी अपनाया कि इससे आत्मशक्ति कमजोर नहीं होने पाती | वे आजादी का आन्दोलन भी
करते है तो उसके साथ सविनय अवज्ञा शब्द जोड़ देते है | यही काम भगवान् श्रीराम के वक्त अयोध्यावासियो ने भी किया था |
जब श्रीराम को पिता दशरथ ने बनवास दे दिया था तब अयोध्यावासी हिंसा के बजाये सविनय
अवज्ञा का रास्ता अपनाते हुए अन्न जल त्याग देते है | भगवन कृष्ण भी गीता में
अर्जुन को ज्ञान देते हुए अप्रिये व् कटु वचनों से बचने कि सलाह देते है | इसलिए
हर व्यक्ति को उन नकारात्मक प्रवृतियों से
बचना चाहिए | क्रोध, कटु-वचन आदि कि जगह , गीत-संगीत , भजन कीर्तन करते हुए तन मन
को सशक्त बनाने का काम करना चाहिए | कहते है कि जो व्यक्ति जैसा सोचता है , वह
वैसा ही हो जाता है | अगर हम सकारात्मक विचारो को मन में आश्रय दे, हिंसा सरीखे नकारात्मक विचार आपके मन में आ ही
नहीं सकते|

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