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Sunday, 12 June 2016

अहिंसा का गुण


प्रथमदृष्टया हिंसा से यह लगता है कि किसी को मारना-पीटना और खून-खराबा करना ही हिंसा है | मोटे तौर  पर तो यह सही भी है , क्योंकि  इस तरह के कार्यो में लगे रहने वाले व्यक्ति का जीवन सकूँन  भरा नहीं हो सकता| सभ्य समाज में कानून का राज स्थापित है | ऐसी स्थिति में कानूनी कार्यवाही में फस कर समय और पैसे की बर्बादी होती है| हिंसा का वैज्ञानिक पक्ष इससे भी ज्यादा गंभीर है | शास्त्रों में क्रोध, द्वेष, कटुवचन, निंदा, घात-प्रतिघात आदि तामसिक अवगुण की श्रेणी में आते है | ये सब हिंसा के ही अस्त्र-शस्त्र है |  व्यक्ति जब इनका प्रयोग करता है, तो दुसरो से ज्यादा क्षति उसकी अपनी होती है |


क्रोध तो वह घातक हथियार है जो क्रोध करने वाले का पहले खून जलाता है | घात-प्रतिघात में आन्तरिक भय होता है जो शरीर के अनेक हिस्सों को कमजोर बनता है | मानसिक रोगी तक लोग हो जाते है | अवसाद की बीमारी की चपेट में आ जाते है | उम्र बढ़ने पर दिमेशिया (भूलने कि बिमारी) हो जाती है | इसलिए ऋषियो-मुनियों ने इससे विरत रहने का उपदेश देते हुए ‘अहिंसा परमो धर्मः ’ का सूत्र वाक्य दिया था |  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अहिंसा का रास्ता इसलिए भी अपनाया कि इससे आत्मशक्ति  कमजोर नहीं होने पाती | वे आजादी का आन्दोलन भी करते है तो उसके साथ सविनय अवज्ञा शब्द जोड़ देते है | यही काम भगवान्  श्रीराम के वक्त अयोध्यावासियो ने भी किया था | जब श्रीराम को पिता दशरथ ने बनवास दे दिया था तब अयोध्यावासी हिंसा के बजाये सविनय अवज्ञा का रास्ता अपनाते हुए अन्न जल त्याग देते है | भगवन कृष्ण भी गीता में अर्जुन को ज्ञान देते हुए अप्रिये व् कटु वचनों से बचने कि सलाह देते है | इसलिए हर व्यक्ति को उन नकारात्मक प्रवृतियों  से बचना चाहिए | क्रोध, कटु-वचन आदि कि जगह , गीत-संगीत , भजन कीर्तन करते हुए तन मन को सशक्त बनाने का काम करना चाहिए | कहते है कि जो व्यक्ति जैसा सोचता है , वह वैसा ही हो जाता है | अगर हम सकारात्मक विचारो को  मन में आश्रय दे,  हिंसा सरीखे नकारात्मक विचार आपके मन में आ ही नहीं सकते| 
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Item Reviewed: अहिंसा का गुण Description: Rating: 5 Reviewed By: Live MEERUT
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