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Saturday, 11 June 2016

भक्त और तर्क

हममे से अधिकांश लोग नियमित  रूप से मंदिरों में पूजा अर्चना के लिए जाते रहते है , लेकिन आश्चर्य यह है कि मंदिरों या देवालयों में जा कर भी हममे से अधिकांश यह नहीं कहते कि हे परमात्मा ! मुझे शांति मिल जाए , मुझे मोक्ष मिल जाए, मैं आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाऊं | इसके बजाये अधिकतर लोग यह मांगते है कि मैं मुकदमा जीत जाऊं , मैं व्यापार में सफल हो जाऊ , मेरी नौकरी लग जाए , मैं परीक्षा में पास हो जाऊ आदि | सिर्फ गिने चुने लोग ही ऐसे होते है कि जो परमात्मा से कुछ नहीं मांगते |


अरे परमात्मा से मांग कर तो आपने उनके साथ व्यापार आरम्भ कर दिया आप किसी मंदिर में जाकर दानस्वरूप कुछ सौ , हजार या लाख रुपये दे देते है और कहते है कि मेरे माता पिता के नाम या मेरे नाम की पट्टी लगा देना | मेरी समझ में नहीं आता कि यह आपकी कौन सी पूजा है, यह आपकी कौन सी श्रध्दा है? आप कहते है कि मैं प्रतिदिन मंदिर जाता हूँ | ऐसे तो आप जीवनभर मंदिर जाते रहेंगे और सोचते रहेंगे कि मेरा कल्याण हो जाएगा परन्तु ऐसा होगा नहीं | मंदिर जाने भर से आपकी हाजरी नहीं लगेगी | ऐसा इसलिए क्योंकि आप मंदिर तो अपनी कामनाओ की पूर्ति के लिए जाते है | हममे से अधिकतर लोग अपनी कामनाओ की पूर्ति के लिए ही मंदिर जाते है और कुछ लोग इसलिए भी मंदिर जाते है कि समाज में सब लोग कहे कि यह तो बहुत ही ईश्वर भक्त आदमी है | दान इसलिए करते है ताकि लोग कहे कि यह बहुत बड़ा दानवीर है |


हम अपने लिए कभी यह पाने की चाहत में रहते है तो कभी वह पाने के लिए लालायित रहते है , लेकिन जब कभी भी मंदिर में जाते है तो हमारे पास कोई न कोई चाहत अवश्य होती है | जो भक्त होता है,  वह आत्मसमर्पण कर देता है जो भक्त है, वह तर्क नहीं करता, क्योंकि वह तर्क से बहार की चीज है | दो ही बाते है या तो आप आध्यात्म के माध्यम से परमात्मा का अनुभव करे या परमात्मा को साक्षात् देखना चाहते है तो आत्मसमर्पण कर दे| अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप परमात्मा को किस रूप में देखना चाहते है ? उसे परमात्मा के रूप में देखना चाहते है  या व्यापारी के रूप में देखना चाहते है या फिर अपनी कामना पूर्ति के रूप में देखना चाहते है|­
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Item Reviewed: भक्त और तर्क Description: Rating: 5 Reviewed By: Live MEERUT
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